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Thursday, October 1, 2009

दर्द ही बस साथ है

पहले प्यार की वो यादें
कुछ बेहद ही हसीं यादें
ज़िन्दगी भर न भुला पाएंगे हम
तेरे ख्यालों में  जो  बीते  कुछ अलसाई  रातें
एक तरफे प्यार का दर्द आज भी कोसता  है
बचपन  में  ही इज़हार  कर  दिया होता तो
शायद हसीन होती ये यौवन  की रातें
अब तो हर कोशिश  उस इक गलती  की
झूठी  भरपाई-सी ही लगती  है
कि अब तो नामुमकिन सा ही लगता है
उसके दिल में जगा पाना अपने लिए
कुछ प्यार-भरी ज़ज्बातें
अब कौन समझाए  उसको
और कैसे समझाए हम खुदको  
ज़िन्दगी यूँ तो बसर न होगी तन्हा
फिर भी ये पागल  मन्  रहता  है
जाने क्यूँ हरदम  सहमा  सहमा
खुशनसीब  हैं वो जो
दिल की बात जुबाँ से कह पते  हैं
हम तो बस दिल का दर्द लिए
अन्दर  ही अन्दर  घुट  कर रह जाते हैं
हम तो प्यार में  यूँ दीवाने हुए
कि दिलबर  की गलियों के चक्कर लगाने लगे
 बस इक झलक पाने को बेकरार रहने लगे
अरे देने वाले इतनी तो अक्ल  दी होती
कि अपने इश्क का इज़हार  भी कर
दिया होता इसी हाथ लगे
कम से कम ज़िन्दगी भर का
ये रोना  तो न होता
इतने बरस  आस  लगा के
सपने देखते  रहे
तुम तो चले गए जाने कब
अपनी हालत तो बस हम ही जानते  हैं 
छुट्टियों  से लौटकर  हम आये जब
सात  बरस  तक बस तुम्हारी
यादें  सजोये
वक़्त काटा   बस ये सोच कर
की तुम भी हो कहीं आँखे  बिछाए
चलो हमारे तड़पते  दिल ने
तुम्हारा पता खोज  ही लिया
बड़ी हिम्मत जुटा   कर
तुम्हारे घर भी पहुंचे
तुमसे मिल तुम्हारे हाथ
का बना  खाना  भी  खाया
मगर अब भी हम हाल-ए- दिल
बयाँ  न कर सके
सब कुछ किया मगर
असल मर्ज़ का इलाज तो किया ही नहीं


खैर जुझारू व्यक्ति हम
चार  साल बाद  हमने
हिम्मत फिर से जुटा ही लिया
आमने  सामने  न सही
सेलफोन  का सहारा लिया
मगर ग्यारह  साल शायद
तुम्हारे लिए लम्बा  वक़्त था
तुम्हे कोई और मिल गया था
इसका तो नहीं पता
मगर हमें  भुला देने के लिए
ये दरम्याँ कहीं ज्यादा था
अब तो बात करना भी गवारा नहीं तुमको
जाने क्या बात है
एक तरफे  इस प्यार का अब
दर्द ही बस साथ है
तुम न सही
तुम्हारे प्यार में
गुजारे  वो  सारे लम्हे 
मेरे साथ हैं ||

-विनय 'विनोद' 

Monday, September 21, 2009

कैसे कह दें

कैसे कह दें  किसी को
प्यार कितना करते हैं उसको
जब वो सुनने को ही राजी नहीं
मनाए कैसे उसको ||


कैसे कह दें किसी को
कि जीना नहीं मुकम्मल
होगा हमारा उसके बिन
कैसे कह दें किसी को ||


जब वो समझते ही नही जज़्बात हमारे
सुनते ही नहीं फरियाद हमारे
कैसे कह दें किसी को
ये दिल के तमाम राज़ हमारे ||

-विनय 'विनोद'

Friday, August 21, 2009

तेरा ख्याल






हर घड़ी किसी की याद रहती है दिल में
हर घड़ी किसी की चाह रहती है दिल में
कुछ ख्वाहिशें हैं दबी सी
दस्तकें जो बार बार देती हैं दिल में ||

क्यों याद करते है उन पलों को
जो सब कुछ भुला देती हैं
क्या वजूद है उनका
जो बार बार गम का परवान चढाती हैं दिल में ||

हम तो वफ़ा करके भी तड़पे
वो बेवफाई करके भी खफ़ा हैं
खता हमने क्या की
कसक जिसकी बार बार उठती है दिल में ||

अब तो उम्मीद भी ना बाकी कोई
बस जीयें जाते हैं
इस नाउमीदी में भी लेकिन
तेरा ख्याल बार बार आता है दिल में ||

अब तो विनोदी समझाता है यही
न आने दे उन ख्यालों को
जो चोट पहुंचाती हैं बार बार दिल में
जो जख्म हरा कर जाती है बार बार दिल में ||

-विनय 'विनोद' द्वारा रचित