कितना सुहाना दिन था
उससे भी सुहानी रात
न कोई सपने न कोई आवाज़
बस मैं था और थी मेरी तन्हाई ||
जब उठा सुबह तो मानो
दुनिया ही हो कोई अलग-सी
अलग-से-विचार
अलग-सी-कल्पनाएँ ||
न जाने क्या छिपा है
इस दिन के आँगन में
जो भी होगा अच्छा ही होगा
दिन के उजाले में ||
अब तो हर सांस कुछ कहती है
जिंदगी के पंख लगा उड़ जाने को कहती है ||
-विनय 'विनोद' द्वारा रचित
जादू टूटता भी तो है।
1 week ago
आपको बधाई हो आपका ब्लॉग जगत में स्वागत हैं निरन्तरता बनाये रखें.
ReplyDelete@ Amit K. सागर जी
ReplyDeleteआप के सराहनापूर्ण स्वागत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्
आगे भी आपकी टिप्पणियों की अपेक्षा रखता हूँ |
@ A Desk Of an Artisan
ReplyDeleteस्वागतीय बधाई के लिए अनेकानेक धन्यवाद्
मैं पूरा प्रयास करूंगा कि निरंतरता बनाये रखूँ
आपके सुझावों का हमेशा स्वागत रहेगा |